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स्टेम सेल्स ने शुरू किया इलाज में नया दौर

Written by  लीड इंडिया, Mail Us: info@leadindiagroup.com Published in Health Thursday, 19 July 2012 06:15

परिवार में किसी को भी जोड़ों की तकलीफ हो, तो सारा परिवार डिस्टर्ब हो जाता है। कारण है हमारा आपसी प्रेम और दूसरे का ख्याल रखने की भावना। लेकिन मोटे तौर पर अर्थराइटिस नामक रोग से हर पांचवा भारतीय पीड़ित है और इस बीमारी ने किसी भी तबके को बख्शा नहीं है।

क्या है अर्थराइटिस

जोड़ों में होने वाले दर्द और सूजन की समस्या को अर्थराइटिस कहते हैं। यह रोग अंतत: कार्टिलेज (जोड़ की गद्दी) को नष्ट कर देता है।

उपचार

शुरुआती दौर में दवाओं और फिजियोथैरेपी द्वारा ज्यादातर मरीजों को ठीक करने की कोशिश की जाती है लेकिन कई बार राहत न मिलने पर अंतिम इलाज के रूप में जोड़ प्रत्यारोपण(ज्वाइंट रिप्लेसमेंट) किया जा सकता है।

नये इलाज

चूंकि कई बार जोड़ प्रत्यारोपण रोगी की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है। 10 से 15 सालों में पुन: प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए विश्व भर में जोड़ों को बचाने की मुहिम चल रही है। इस मुहिम के लिये कार्यरत आर्थो बॉयलोजिक ग्रुप के वैज्ञानिकों ने मुख्यत: बोन मैरो से प्राप्त सेल्स और प्लेटलेट रिच प्लाज्मा (पीआरपी) का प्रयोग करके पिछले कई सालों से जोड़ों को बचाये रखा है। बीते दिनों मुंबई में संपन्न हुई आर्थोपेडिक सर्जन्स की अंतरराष्ट्रीय कान्फ्रेन्स में स्पेन से आये डा.रेमन पुगेट ने विगत 8 साल में 3500 रोगियों पर बोन मैरो से प्राप्त सेल्स और प्लेटलेट रिच प्लाज्मा के प्रयोग से संबंधित सफल प्रयोगों के आंकड़े पेश किये। इसी तरह इटली से आये प्रोफेसर एलबर्टो गोबी ने बोन मैरो से प्राप्त सेल्स द्वारा कार्टिलेज रीजनरेशन की विधि को प्रदर्शित किया।

जोड़ नष्ट होने से पहले ऐसे बचाएं

कुछ रोग जैसे रूमैरायड अर्थराइटिस, एनकायलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस और सोरियाटिक अर्थराइटिस आदि इस प्रकार की बीमारियां हैं, जहां जोड़ की कार्टिलेज बहुत जल्दी नष्ट होती है। यही वजह है कि जोड़ संबंधी समस्याओं से पीड़ित युवा रोगियों को भी जोड़ प्रत्यारोपण करवाना पड़ रहा है। ऐसे में मीसेनकायमल स्टेम सेल्स की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, जो बीमारी के प्रभाव को कम करने के साथ-साथ टिस्यू रीजनरेशन (ऊतकों का पुनर्निर्माण) का काम भी करती हैं। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय जागरूकता के चलते स्टेम सेल से संबंधित नयी विधियों का प्रयोग अमेरिकी प्रोफेसर मोटनर से लेकर प्रसिद्ध आस्ट्रेलियन आर्थो-सर्जन डॉ. जॉन फ्लिन तक कर रहे हैं। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में भी पिछले तीन सालों के दौरान अर्थराइटिस से संबंधित नई विधियों के जरिये लगभग एक हजार से अधिक रोगियों का इलाज हुआ है, जिसमें स्टेम सेल्स थेरेपी की भूमिका मुख्य रही।

Read 865 times Last modified on Wednesday, 16 October 2013 13:20

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