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मशीनी यंत्रों में ढलता बचपन!

Written by  Published in Technology Thursday, 19 July 2012 06:21

आज के समय में सुबह का अखबार उठाते ही चोरी, हत्या, डकैती, लूट जैसी घटनाएं हम चाय की चुस्कियों के साथ खुद में समाहित कर रहे हैं। 

 

वयस्कों की बात छोड़िए, बालमन भी इनसे इस तरह प्रभावित हो रहा है कि उन्हें रोज होने वाली ये घटनाएं एडवेंचरस लगने लगी हैं। वे इन खबरों पर ठीक उस तरह ध्यान देते हैं जैसे कम्प्यूटर पर कोई गेम की सीडी लगा दी गई हो।

 

बालमन कच्ची मिट्टी की तरह होता है- जैसे ढाल दो, वैसे ही ढल जाता है। और यह बात बिल्कुल सही है। मगर यह समस्या सिर्फ हमारे देश तक ही सीमित नहीं है।

 

दुनिया के समस्त देशों में, यहां तक कि विकसित देशों में भी बच्चे उम्र से पहले बड़े कर दिए जा रहे हैं।

 

हाथों में तकनीकी यंत्र थमा कर उन्हें छोटी उम्र में ही बड़ा कर दिया जा रहा है, जिससे वे मस्ती करना, खेलना सब भूल गए हैं।

 

तकनीक प्रधान इस युग में, प्रयोगों की इस उठापटक में हम भूल गए हैं कि बालमन प्रयोग होने की वस्तु नहीं है।

 

उनके मस्तिष्क को पिटारे की तरह इस्तेमाल न होने देना मानवता का प्रथम कर्त्तव्य है। वैसे कई शोधों में कहा भी गया है कि बाल मस्तिष्क जितना अच्छा विकास प्राकृतिक रूप से करता है, उतना कृत्रिम रूप से नहीं।

 

इसीलिए अवसाद जैसी बीमारी उम्र से पहले ही यौवन को अपनी जकड़ में ले रही है और हम मानसिक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं।

 

यह कई शोधों में प्रमाणित हो चुका है कि गांवों में, जहां तकनीकी साधनों का प्रयोग इतना उच्च नहीं है और जहां बच्चे प्रकृति की गोद में खेलते हैं, वहां के बच्चों का बौद्धिक स्तर ज्यादा होता है।

 

ये और बात है कि वे शहरी बच्चों की तरह सभी प्रकार की जानकारियों से अवगत नहीं हो पाते हैं, मगर उन्हें सिखाया जाए तो वे शहरी बच्चों से ज्यादा अच्छा रिजल्ट देते है।

 

गांव के बच्चों की मानसिक दृढ़ता और परेशानियों से लड़ने की क्षमता शहरी बच्चों के मुकाबले बेहतर होती है। 

 

बचपन को खुलकर हंसना-खेलना चाहिए, मगर बचपन एक खिलौना बन कर रह गया है। हमें बच्चों को प्राकृतिक परिवेश में पलने और बढ़ने देने की जरूरत है।

Read 9153 times Last modified on Wednesday, 16 October 2013 10:45

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